धुर्वाराव माड़िया: एक व्यक्तित्व

धुर्वाराव माड़िया

धुर्वाराव माड़िया

लिंगागिरी विद्रोह के नायक

अंग्रेजो की दमनकारी नीति तथा जल जंगल जमीन के दोहन के कारण सन् 1856-57 में लिंगागिरी का विद्रोह प्रारंभ हुआ । इस विद्रोह के नेतृत्वकर्ता धुर्वाराव माड़िया लिंगागिरी के तालुकेदार थे । वे लिंगागिरी कोअंग्रेजो से मुक्तरखना चाहते थे । धुर्वाराव माड़िया ने दोरला, माड़िया, मुरिया जनता के लोगों को संगठित कर संघर्ष प्रारंभ किया गया जिसे लिंगागिरी विद्रोह के नाम से जाना जाता है, 3 मार्च1856 ई.को धुर्वाराव माड़िया और अग्रेजो के सैनिको के बीच चिंतलवार में युद्ध हुआ जो लगभग दो वर्ष तक चला, जिसमे धुर्वाराव माड़िया पकड़े गये और अंग्रेजों द्वारा धुर्वाराव माड़िया को 5 मार्च 1856 ई. को षडयंत्रपूर्वक पकड़कर एक उंचे साल पेड़ पर फांसी दे दिया गया । शहीद गेंदसिंह के बाद "धुर्वाराव माड़िया को बस्तर का दूसरा शहीद कहा जाता है । यह लिंगागिरी विद्रोह बस्तर का महान मुक्तिसंग्राम कहलाता है । ऐसे महान शहीद के स्मृति को चीर स्थायी बनाये रखने के लिए शासकीय महाविद्यालय भैरमगढ़ जिला बीजापुर का नामकरण धुर्वाराव माड़िया शासकीय महाविद्यालय भैरमगढ़ जिला बीजापुर के नाम से किया गया है ।